Thursday, January 20, 2011

महंगाई का अर्थशास्त्र-हिन्दी व्यंग्य (black economics-hindi satire article)



किसी भी देश की मुद्रा पर अर्थशास्त्र में अनेक बातें पढ़ने को मिलती हैं पर उसके संख्यांक पर कहीं अधिक पढ़ने को नहीं मिलता अर्थात मुद्रा एक से लेकर एक हजार तक के अंक में छापी जाये या नहीं इस पर अधिक चर्चा नहीं मिलती। हम सीधी बात कहें तो डालर या सौ रुपये से ऊपर हो या नहीं इस पर अर्थशास्त्री अधिक विस्तार से विचार नहीं रखते। वजह शायद यह है कि आधुनिक अर्थशास्त्र की संरचना भी पुरानी है और तब शायद यह मुद्दा अधिक विचार योग्य नहीं था। इसलिये नये संदर्भ ंअब अर्थशास्त्र में जोड़ा जाना आवश्यक लगता है। हम बात कर रहे हैं भारत के सौ रुपये के ऊपर से नोटों की जिनका प्रचलन ऐसी समस्यायें पैदा कर रहा है जिनकी जानकारी शायद अर्थ नियंत्रण कर्ताओं को नहीं है। कभी कभी तो लगता है कि काली अर्थव्यवस्था के स्वामी अपने काला अर्थशास्त्र भी यहां चलाते हैं।
कुछ समय पूर्व योग शिक्षक स्वामी रामदेव ने बड़े अंक वाली मुद्रा छापने का मसला उठाया था पर उसे भारतीय प्रचार माध्यमों ने आगे नहीं बढ़ाया। एक दौ टीवी चैनल ने इस पर चर्चा की तो अकेले बाबा रामदेव के मुकाबले अनेक वक्ता थे जो भारत में पांच सौ और हजार के नोटों के पक्षधर दिखाई दिये क्योंकि वह सभी बड़े शहरों के प्रतिबद्ध तथा पेशेवर विद्वान थे जो संभवत प्रचार माध्यमों द्वारा इसी अवसर के लिये तैयार रखे जाते हैं कि कब कोई बहस हो और उनसे मनमाफिक बात कहलवाई जाये। यही हुआ भी! एक ऐसे ही विद्वान ने कहा कि ‘बड़े अंक की मुद्रा से उसे ढोने में सुविधा होती है और महंगाई बढ़ने के कारण रुपये की कीमत गिर गयी है इसलिये हजार और पांच सौ के नोट छापने जरूरी है।’
हैरानी होती है यह देखकर कि एक बहुत ही महत्व के मुद्दे पर कथित बुद्धिजीवी खामोश हैं-शायद कारों में घूमने, ऐसी में बैठने वाले तथा होटलों में खाना खाने वाले यह लोग नहीं जानते कि छोटे शहरों और गांवों के लिये आज भी हजार और पांच सौ का नोट अप्रासंगिक है। अनेक वस्तुऐं महंगी हुईं है पर कई वस्तुऐं ऐसी हैं जो अभी भी इतनी सस्ती हैं कि पांच सौ और हजार के नोट उससे बहुत बड़े हैं। टीवी, फ्रिज, कार, कंप्यूटर खरीदने में पांच सौ का नोट सुविधाजनक है पर सब्जियां तथा किराने का सामान सीमित मात्रा में खरीदने पर यह नोट बड़ा लगता है। दूसरा यह भी कि जिस अनुपात में आधुनिक सामानों के साथ उपभोक्ता वस्तुओं में मूल्य वृद्धि हुई है उतनी सेवा मूल्यों में नहीं हुई। मजदूरों की मजदूरी में वृद्धि बहुंत कम होती है तथा लघू तथा ग्रामीण व्यवसायों में भी कोई बजट इतना बड़ा नहीं होता। वहां अभी भी सौ रुपये तक का नोट भी अपनी ताकत से काम चला रहा है तब पांच सौ तथा हजार के नोट छापना एक तरह से अर्थशास्त्र को चुनौती देता लगता है।
साइकिल के दोनों पहियों में हवा आज भी एक रुपये में भरी जाती है तो दुपहिया वाहनों के लिए दो रुपये लगते हैं। बढ़ती महंगाई देखकर यह विचार मन में आता है कि कहीं भारतीय अर्थव्यवस्था को हजार और पांच सौ नोटों के प्रचलन योग्य बनाने का प्रयास तो नहीं हो रहा है। कभी कभी तो लगता है कि जिन लोगों के पास पांच सौ या हजार के नोट बहुत बड़ी मात्रा मैं है वह उसे खपाना चाहते हैं इसलिये बढ़ती महंगाई देखकर खुश हो रहै हैं क्योंकि उसकी जावक के साथ आवक भी उनके यहां बढ़ेगी। दूसरी बात यह भी लगती है कि शायद पांच सौ और हजार नोटों की वजह से पांच तथा दस रुपये के सिक्के और नोट कम बन रहे हैं। इससे आम अर्थव्यवस्था में जीने वाले आदमी के लिये परेशानी हो रही है। आम व्यवस्था इसलिये कहा क्योंकि हजार और पांच सौ नोट उसके समानातंर एक खास अर्थव्यवस्था का प्रतीक हैं इसलिये ही अधिक रकम ढोने के लिये जो तर्क दिया जा रहा है जो केवल अमीरों के लिये ही सुविधाजनक है।
अनेक जगह कटे फटे पुराने नोटों की वजह से विवाद हो जाता है। अनेक बार ऐसे खराब छोटे नोट लोगों के पास आते हैं कि उनका चलना दूभर लगता है। उस दिन एक दुकानदार ने इस लेखक के सामने एक ग्राहक को पांच का पुराना नोट दिया। ग्राहक ने उसे वापस करते हुए कहा कि ‘कोई अच्छा नोट दो।’
दुकानदार ने उसके सामने अपनी दराज से पांच के सारे नोट रख दिये और
कहा कि ‘आप चाहें इनमें से कोई भी चुन लो। मैंने ग्राहकों को देने के लिये सौ नोट कमीशन देकर लिये हैं।’
वह सारे नोट खराब थै। पता नहीं दुकानदार सच कहा रहा था या झूठ पर पांच के वह सभी नोट बाज़ार में प्रचलन योग्य नहीं लगते थे। पुरानी मुद्रा नहीं मुद्रा को प्रचलन से बाहर कर देती है-यह अर्थशास्त्र का नियम है। इसे हम यूं भी कह सकते हैं कि नयी मुद्रा पुरानी मुद्रा को प्रचलन में ला देती है पर इसके पीछे तार्किक आधार होना चाहिए। ऐसे पुराने और फटे नोट बाज़ार में प्रचलन में रहना हमारी बैकिंग व्यवस्था के लिये बहुत बड़ी चुनौती है।
हम यहां बड़ी मुद्रा के प्रचलन का विरोध नहीं कर रहे पर अर्थनियंत्रणकर्ताओं को छोटे और बडे नोटों की संरचना के समय अर्थव्यवस्था में गरीब, अमीर और मध्यम वर्ग के अनुपात को देखना चाहिए। वैसे यहां इस बात उल्लेख करना जरूरी है कि जितने भी विकसित और शक्तिशाली राष्ट्र हैं उनकी मुद्रा का अंतिम संख्यांक सौ से अधिक नहीं है। इसलिये जो देश को शक्तिशाली और विकसित बनाना चाहते हैं वह यह भी देखें कि कहंी यह बड़ी मुद्रा असंतुलन पैदा कर कहीं राष्ट्र को कमजोर तो नहीं कर देगी। कहीं हम आधुनिक अर्थशास्त्र को पढ़कर कहीं काला अर्थशास्त्र तो नहीं रचने जा रहे यह देखना देश के बुद्धिमान लोगों का दायित्व है।
—————-MOHD NADEEM

सिस्टम नही बदलना चाहिए....ज्योति की ब्रेकिंग न्यूज़



भोपाल के I.A.S. दंपत्ति के सरकारी आवास से करोड़ों रुपये,विदेशी मुद्रा ,जेवर आयकर विभाग ने छापा मार कर बरामद किये । घूसखोरी से जमा किये ये रूपये इनके सत्कार के लिए हम लोगों ने ही दिया होगा। पता नही क्यों इनको पुरस्कार नही दिया गया, ये सम्मान के हक़दार है क्योकि सिस्टम थोड़ी न खराब है इन्होने बस इसे लचीला बना दिया है। हर रोज़ हम लेने देने के चक्कर में पड़ते रहते है। चपरासी से लेकर बड़े अधिकारी, मंत्री जी सब टेबल के नीचे से खाने में नही हिचकते। अगर आप ऐसा नही करते तो जल्दी शुरू कर दीजिये नही तो सिस्टम से बाहर हो जायेंगे। पैसा कमाने का नशा एक बीमारी बन कर पुराने सिस्टम को ध्वस्त कर दिया है। भ्रष्टाचार सिस्टम का जन्म हुआ है। कहते है कि अगर एक सिस्टम को 90% मनुष्यों द्वारा अपना लिया जाये तो बाकी १० % को भी उसे follow (अपनाना) करना चाहिए। इससे ये सिस्टम सार्वभौमिक व्यवस्था बन जाएगी। फिर भ्रष्टाचार कहीं नही रहेगा। भ्रष्टाचार, घूसखोरी की मजबूत नाव में बैठ कर आप दुनिया का 'कमोर्शियल (commercial) अत्याचार' सहन करते हुए भवसागर को पार कर लेंगे पर सत्याव्रती की टूटी नाव से बीच में ही डूब जायेंगे। समय रहते जल्दी मजबूत नाव पर सवार हो जाये नही तो आपका कुछ नही हो सकता। भारतीय दंड संहिता की धारा १७१ में जो लिखा है उससे डरिये नही ये तो सिर्फ किताबों में लिखी मिलती है असल में इनके कोई मायने नही है। वास्तविक वेतन से आप अपना घर चला नही सकते ना.... वैसे आप थोड़े न लेते है वो लोगो का प्यार है जो आपके सत्कार में कुछ चढ़ावा दे जाते है।अपनी गोष्ठी लगा कर घूसखोरी पर चर्चे करो बहस करो पर इसकी जड़ों को मत काटना , नही तो सिस्टम बिगड़ जायेगा। हम तो पूरे सम्मान से घूस लेंगे और देंगे। इस सिस्टम को अपना कर आप जल्द ही अमीर बन जायेंगे और समाज में आपका नाम होगा। बहुत जल्दी आप दुनिया में भी अपना परचम लहरायेंगे। तो आइये हम सभी कान में रुई डालकर अंधे बन जाये और जीवन को सफल बनाये । 'जय हो भ्रष्ट सिस्टम की' !!!



MOHD NADEEM....

Monday, January 17, 2011

वनडे की सर्वश्रेष्ठ टीम में सचिन और कपिल

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दुनिया भर के क्रिकेट प्रशंसकों ने सचिन तेंदुलकर और वीरेंदर सहवाग को एकदिवसीय क्रिकेट की आज तक की सर्वश्रेष्ठ सलामी जोड़ी चुना है.

अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद ने एकदिवसीय क्रिकेट की चालीसवीं वर्षगाँठ पर बुधवार को आज तक की सर्वश्रेष्ठ एकदिवसीय टीम घोषित की.

इस सूची में ऑस्ट्रेलिया और भारत के तीन-तीन, वेस्ट इंडीज़ के दो और दक्षिण अफ़्रीका, श्रीलंका और पाकिस्तान का एक-एक खिलाड़ी शामिल है.

भारत की ओर से तीसरा नाम कपिल देव का है, जिन्हें लोगों ने अब तक का सबसे अच्छा ऑलराउंडर चुना.

आईसीसी की वेबसाइट पर 97 देशों के लगभग छह लाख लोगों ने राय रखी और उन लोगों के मुताबिक़ 2006 में जोहानेसबर्ग में दक्षिण अफ़्रीका और ऑस्ट्रेलिया के बीच हुआ वो वनडे मैच आज तक का सबसे अच्छा वनडे था जिसमें 438 रन बनाकर दक्षिण अफ़्रीका ने जीत हासिल की थी.

लोगों की ओर से चुनी गई वनडे टीम में मध्य क्रम में वेस्टइंडीज़ के ब्रायन लारा और विवियन रिचर्ड्स को ऑस्ट्रेलियाई रिकी पॉन्टिंग के साथ जगह मिली है.

लोगों ने विकेटकीपर के तौर पर ऑस्ट्रेलियाई एडम गिलक्रिस्ट को चुना तो स्पिनर मुथैया मुरलीधरन रहे.

पाकिस्तान के वसीम अकरम, ऑस्ट्रेलियाई ग्लेन मैक्ग्रा और दक्षिण अफ़्रीकी एलन डोनल्ड तेज़ गेंदबाज़ के रूप में लोगों की पसंद रहे.

जोहानेसबर्ग में सर्वश्रेष्ठ वनडे


इस टीम में 12वें खिलाड़ी के तौर पर ऑस्ट्रेलियाई माइकल बेवन को चुना गया है जिन्हें काफ़ी वोट मिले मगर वो इतने नहीं थे कि वे पहले 11 खिलाड़ियों में शामिल हो पाते.

आईसीसी ने वेबसाइट पर 48 खिलाड़ियों की एक सूची रखी थी और उसमें से प्रशंसकों को अपनी पसंद के 11 खिलाड़ी चुनने थे.

लोगों के पास आज तक का सबसे रोमाँचक वनडे मैच चुनने का मौक़ा भी था और रनों की बौछार वाला 2006 का दक्षिण अफ़्रीका और ऑस्ट्रेलिया वाला मैच लोगों की पसंद रहा.

उस मैच में पहले बल्लेबाज़ी करते हुए ऑस्ट्रेलिया ने चार विकेट के नुक़सान पर 434 रन बनाए थे जिसमें कप्तान रिकी पॉन्टिंग ने सिर्फ़ 105 गेंदों पर 164 रन ठोंक दिए थे.

उसके बाद जवाबी पारी में जब दक्षिण अफ़्रीका का पहला विकेट सिर्फ़ तीन रनों के ही स्कोर पर गिर गया था तो लोगों ने उम्मीद छोड़ ही दी थी मगर फिर 111 गेंदों में 175 रनों की हर्शल गिब्स की और 55 गेंदों पर 90 रनों की ग्रीम स्मिथ की पारी ने मैच का रुख़ मोड़ दिया.

लोगों को उम्मीद नहीं थी कि इतने बड़े स्कोर का ऑस्ट्रेलियाई आक्रमण का मुक़ाबला करते हुए पीछा किया जा सकता है मगर दक्षिण अफ़्रीका ने एक विकेट और एक गेंद बाक़ी रहते वो मैच जीत लिया.

ऑस्ट्रेलिया और इंग्लैंड के बीच पाँच जनवरी 1971 को मेलबर्न क्रिकेट मैदान पर पहला एकदिवसीय मैच खेला गया था और उसे याद करते हुए आईसीसी ने ये वोटिंग करवाई है.